जम्मू और कश्मीर के परिसीमन से किसका फायदा और किसका नुकसान

जम्मू और कश्मीर के परिसीमन से किसका फायदा और किसका नुकसान

परिसीमन आयोग की अंतिम रिपोर्ट ने कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों की नींद उड़ा दी है। इन पार्टियों को लग रहा है कि अब सूबाई राजनीति में उनका दबदबा समाप्त हो जाएगा। वैसे सच यह भी है कि नई विधानसभा सीटों से इस केंद्रशासित प्रदेश का राजनीतिक असंतुलन खत्म हो जाएगा। इस रिपोर्ट से सबसे ज्यादा बौखलाहट फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को हो रही है। उनकी बौखलाहट का मुख्य कारण यह है कि परिसीमन आयोग ने लगभग ढाई दर्जन विधानसभा सीटों का गणित बदल दिया है। स्थिति यह है कि फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी के अल्ताफ बुखारी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष पीरजादा मोहम्मद सईद जैसे बड़े नेताओं को नई जमीन तलाशनी पड़ सकती है।

परिसीमन आयोग ने परिसीमन अधिनियम 2002 की धारा 9 (1) (ए) के प्रावधानों और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत अपनी अंतिम रिपोर्ट में सात विधानसभा सीटें बढ़ाई हैं। इसमें कश्मीर में एक सीट बढ़ाई गई है और जम्मू में छह। इस तरह कश्मीर में सीटें बढ़कर 47 हो गई हैं, जबकि जम्मू में 43। अब यहां की विधानसभा में कुल 90 सीटें हो गई हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक आरक्षण देते हुए परिसीमन आयोग ने इस समुदाय के लिए नौ सीटें आरक्षित की हैं। राज्य के सबसे बड़े एसटी समुदाय में शुमार गुज्जर-बकरवाल पिछले तीन दशक से इस आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे थे। मगर एनसी, पीडीपी और कांग्रेस ने कभी उनका साथ नहीं दिया, क्योंकि उनको लगता था कि इस आरक्षण से कश्मीर के राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे। यहां बताना जरूरी है कि जम्मू कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल मुस्लिम समुदाय से आते हैं, जबकि राजस्थान, हरियाणा और देश के दूसरे इलाकों में ये हिंदू हैं। जम्मू-कश्मीर में इनकी जनसंख्या सर्वाधिक जम्मू क्षेत्र के दो जिले- पूंछ और राजौरी में है, जबकि कश्मीर क्षेत्र में ये लोग गांदरबल और अनंतनाग जिलों में पाए जाते हैं। अनुच्छेद 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में इस समुदाय के लिए कई बड़े कानून लागू हुए हैं। मसलन, आदिवासी वन संरक्षण अधिनियम, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम और संविधान का 73वां संशोधन अधिनियम। इन कानूनों के लागू होने से इस जनजाति समुदाय में सरकार के प्रति भरोसा खासा बढ़ा है।

विधानसभा में सीटें बढ़ाने के साथ ही परिसीमन आयोग ने यह सिफारिश भी की है कि कश्मीरी विस्थापितों के कम से कम दो सदस्य विधानसभा में नामित किए जाएं और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के विस्थापितों को भी विधानसभा में जगह दी जाए। हालांकि, इस क्षेत्र के कितने सदस्य नामित किए जाने चाहिए, यह फैसला आयोग ने केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। मगर अभी यही स्थिति बन रही है कि 90 विधानसभा सीटों के अलावा दो सीटों पर कश्मीरी विस्थापित व चार से छह पर पीओजेके के विस्थापितों को नामित सदस्य बनाया जा सकता है। इस तरह, विधानसभा सदस्यों की संख्या 96 से 98 तक हो जाएगी। मगर ऐसा होने के लिए सरकार को एक बार फिर सांविधानिक संशोधन करना पड़ सकता है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के अनुसार यहां पर 90 विधानसभा सीटें ही हो सकती हैं।

राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि इन दोनों विस्थापितों को मिलने वाली सीटों के बाद जम्मू में कश्मीर से ज्यादा सीटें हो जाएंगी। आयोग ने कहा है कि पुडुचेरी विधानसभा की तरह ही इन नामित सदस्यों को वोट देने का अधिकार भी मिलेगा। यदि पीओजेके विस्थापितों को चार सीटें मिलीं, तो जम्मू की सीटें 43 से बढ़कर 49 हो जाएंगी और यदि उनको छह सीटें मिलीं, तो यह संख्या 51 हो जाएगी। दोनों ही दशा में कश्मीर की 47 सीटों में कोई बदलाव नहीं आएगा। जाहिर है, अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा गुज्जर-बकरवाल, अनुसूचित जाति, कश्मीरी और पीओजेके विस्थापितों के सहारे सत्ता में आने की कोशिश करेगी। पार्टी का यह सपना भी पूरा हो सकता है कि जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री जम्मू क्षेत्र से हो। इसका फायदा उसे 2024 के लोकसभा चुनावों में भी मिल सकता है।

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